Tuesday, May 12, 2009

भारतीय रंगमंच की दशा और दिशा

भारतीय रंगमंच की दशा और दिशा विषय में यह निहित है कि हम दशा नहीं दुर्दशा की बात कर रहे हैं। ये बात बहुत सालों से कही जा रही है कि रंगमंच की दुर्दशा हो गई है और रंगमंच दिशाहीन हो गया है। दशा सुधारना है और दिशा सही करना है। दशा कब अच्छी थी ? कब दिशा थी ? और एक प्रश्न और है वो ये कि जो भी दिशा थी वो क्या आपको पसंद थी ? कौन से काल को आप स्वर्णिम युग कहेंगे ? और आज का युग कैसा युग है ? किस धातु का युग है ?
जो लोग रंगकर्म करते हैं यानी रोज रिहर्सल करते हैं और हर कुछ दिन में मंचन करते हैं उनकी स्थिति और एक प्रेक्षक की स्थिति में फर्क है। रंगकर्म करने वालों की समस्यायें अलग हैं और देखने वालों की समस्याएं अलग हैं। देखने वाले को करने वाले की समस्या से कोई वास्ता नहीं है। प्रेक्षक को केवल मंच पर होने वाला कार्यव्यापार देखना है। उसे मंचन करने वाले की समस्या से कोई मतलब नहीं है। जबकि रंगमंच की समीक्षा करने के लिये दशा और दिशा की पड़ताल करने के लिये सामग्री तो रचना करने वाला उपलब्ध कराता है।
एक समस्या नाटकों के आलेख की उपलब्धता की है। बहुत से अच्छे नाटक हैं। अपनी भाषा में और दुनिया की दूसरी भाषाओं में। मगर हर नाटक हर एक के बस का रोग नहीं है। दल को देखना पड़ता है कि कौन सा नाटक करने लायक लोग हमारे पास है। कितना पैसा लगेगा और उसमें से कितना अपने पास है ? जो
नाटक उपलब्ध हैं उसमें से कौन सा नाटक हम कर सकते हैं, किसके लायक कलाकार हमारे पास है ? किस नाटक के शो मिल सकते हैं ? किस पर पैसा खर्च किया जाये। नाटक को सैट कैसा हो ताकि नाटक कहीं भी ले जाया जा सके। कभी कभी शासकीय संस्थानों में नाटक तैयार होते हैं उनमें निर्देशक को ये आजादी होती है कि वो मनचाही स्क्रिप्ट चुन ले। मनचाहे कलाकार ले ले और बिना दर्शकों की परवाह किये नाटक तैयार कर ले। ऐसे नाटक देखकर दर्शक फिर चाहे उनकी संख्या जितनी भी हो जब बाहर निकलता है तो यही कहता है कि इतना पैसा खर्च करके कैसा नाटक तैयार किया है। आशय यह है कि एक ओर संस्था एक एक पैसे और एक एक दर्शक का हिसाब रखती है और दूसरी ओर कोई परवाह नहीं रहती जबकि सब जानते हैं कि आखिर नाटक दर्शक के लिये ही तैयार किया जाता है।
दशा दिशा का एक महत्वपूर्ण तत्व नाटक का मौलिक और अपनी भाषा में लिखा होना माना जाता है। ये बात सिद्धांत के तौर पर कही जा सकती है पर व्यावहारिक तौर पर नही। इसी प्रकार नाटक नाटक के तौर पर ही लिखा हो यह भी जरूरी माना जाता है। यानी नाटक किसी उपन्यास, कहानी पर आधारित न हो। रंगसंस्था अपने सीमित साधनों में काम करती है और नाटक के चुनाव के समय में नाटक की संप्रेषणीयता और रोचकता को ध्यान में रखती है। ये जिद केवल एकाध संस्था ही पालती है कि हम केवल अपनी भाषा में लिखा नाटक ही करेंगे। वरना सब यही देखते हैं कि कौन सा नाटक हम कर सकते हैं और दर्शकों को अच्छा लगेगा। इसी लिये देशी विदेशी और लोकभाषा के सभी किस्म के नाटक किये जाते हैं। कहानी मंचन, उपन्यास मंचन और कविता मंचन के माध्यम से रंगजगत बहुत सशक्त हुआ है। बहुत से अच्छे नाटक दर्शकों को देखने को मिले हैं। उसी तरह विदेशी नाटकों के भी बहुत अच्छे मंचन होते हैं। उन्हें केवल इसी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वो विदेशी नाटक हैं। दर्शक तो अच्छा नाटक देखने आता है वो देशी विदेशी का भेदभाव पसंद नहीं करता।
आज भी हिन्दी जगत में कुछ नाटक बारंबार खेले जा रहे हैं और उनको खेले जाने का कारण बहुत प्रशंसनीय नहीं है। मसलन अंधा युग, आषाढ का एक दिन या आधे अधूरे। ये नाटक इतने बार और इतनी विविधताओं के साथ मंचित हो चुुके हैं कि अब इनमें कोई संभावना नहंीं बची है। इनको यदि मंचित किया जाता है तो निश्चित रूप से निर्देशक की दशा और दिशा मंे खोट है। हिन्दी में नाटकों की इतनी भी कमी नहीं है कि इन्हीं नाटकों को बारंबार खेलने की नौबत आए। मगर सफलता की गारंटी और स्क्रिप्ट चुनने की चुनौती से बचने के लिये ये नाटक ढाल का काम करते हैं।
आज छोटे शहर से लेकर महानगरों तक रंगकर्मी एक ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं जो कुछ साल पहले तक नहीं थी। रंगकर्म से जुड़ने वाले युवाओं का अभाव। शिक्षा का जो कार्य व्यापार चल रहा है उसका ये परिणाम है कि पूरे साल युवा और बच्चे पढ़ाई, कोचिंग, सेमिनार और परीक्षाओं में लगे हुए हैं। उनके पास वास्तव में समय नहीं है कि वो कोई भी अतिरिक्त गतिविधि करें। उनके पाठ्यक्रम में मातृभाषा की जगह कम्प्यूटर पढ़ने की सुविधा दे दी गई है। जब साहित्य पढ़ेगा नहीं तो साहित्य को मंचित कैसे करेगा और साहित्य को मंच पर देखेगा कैसे। ये हमारे समय का सवाल है। इससे कोई निपट सकता है या नहीं ये तो नहीं मालूम पर हां ये एक बहुत बड़ी व्यावहारिक समस्या है। विवेचना ने अभी महाविद्यालयों में एक दिन का शिविर लगाया, उसका अनुभव बहुत अच्छा रहा। काफी युवाओं से बात हुई। वो जुड़ना चाहते हैं पर समय की कमी है। हमें काम करना है तो उनकी उपलब्धता के हिसाब से समय तय करना होगा।
मातृभाषा में नाटकों की कमी है। क्यों है ? क्योंकि नाटक बहुत कम होते हैं फिर नाटक से लेखकों का जुड़ाव ही नहीं है। जो बहुत अच्छे नाटक लिखे गये हैं देखा जाए तो उनके पीछे नाटककार का नाटक और रिहर्सल से जुडे़ होना रहा है। यह जरूरी नहीं है कि बहुत अच्छा कहानी लेखक या उपन्यास लेखक बहुत अच्छा नाटककार बन ही जाये। फिर यह भी देखा गया है कि अधिकांश साहित्यकार तो नाटक देखने ही नहीं जाते। नाटक कहां से लिखेंगे। यदि लेखक नाट्य संस्थाओं से जुड़ें और लगातार काम करें तो कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ अच्छे नाटक हमें मिलें।
नाटक की दशा बहुत खराब नहीं है। हां आज के समय में इलेक्ट्राॅनिक आक्रमण के कारण स्थितियां बहुत बदल गईं हैं। पुरानी नाट्य संस्थाएं बंद हो रही हैं और नई पैदा हो रही हैं। नए नए रंगकर्मी नई ऊर्जा के साथ मैदान में उतर रहे हैं। नए नए नाटक लिखे जा रहे हैं। मंचित हो रहे हैं। हां पहले छोटे छोटे शहरों में नाटक बहुत होते थे। अब नहीं होते। अब हम लोग केवल पुराने लोगों की कहानियां सुनते हैं। क्या जुनूनी लोग थे। अब अचानक किसी शहर में कोई लड़का पंहुचता है और एक नाट्य शिविर लगाकर कुछ लोगों को जोड़ता है। कुछ शिष्य तैयार होते हैं और फिर ये नौजवान अचानक फुर र्र र्र हो जाता है। मुम्बई या कहीं और। नए शिष्यों में से भी कुछ मुम्बई चल पड़ते हैं।उस शहर के रंगकर्म की इतिश्री हो जाती है। या फिर इस तरह का नौजवान किसी शहर में पंहुचकर किसी संस्था से जुड़ता है और फिर उसे तोड़ फोड़ कर चल देता है। ये नकारात्मक बात है पर बहुत बार शिविरों से फायदा भी होता है। युवाओं को पहली बार नाट्य जगत से परिचय मिलता है। वो काफी सीखते हैं जो उनके जीवन में काम आता है। वो रंगकर्म से जुड़ते हैं। साथ ही रंगकर्म की दशा सुधारते हैं।
नाटक का निर्देशक बनने में बरसों लगते हैं। बहुत से अच्छे बुरे नाटक करने, बहुत कुछ पढने, देखने के बाद वर्षों में एक निर्देशक तैयार होता है। जो रंगकर्म की दशा सुधारने और दिशा देने में मदद कर सकता है। ऐसी घटनाएं इतनी कम होती हैं कि हम बरसों तक किसी शहर से एक ही नाम सुनते रह जाते हैं।
एक समस्या भौतिक है। अच्छे नाट्यगृह और अच्छे रिहर्सल रूम की नहीं हैं। नाट्यगृह के नाम पर जो बैडमिंटन हाॅल या स्कूल काॅलेज का मंच मिलता है उसे नाटक लायक बनाने मंे हजारों रूपये लगते हैं। एक शो में दस पंद्रह हजार रूपये खर्च हो जाता है और आय शून्य। अब कहां से हो नियमित रंगकर्म। नियमित रंगकर्म नहीं होगा तो दर्शक नहीं बनेगा। दर्शक नहीं होगा तो रंगकर्म कहां से होगा। यह एक चक्रव्यूह है जिसमें देश का रंगकर्म फंसा हुआ है।
इन परिस्थितियों में देश में रंगकर्म की दशा जैसी भी है ठीक है। ंइससे ज्यादा अच्छी कैसे हो सकती है। दशा सुधारने के लिये अनेक सुझाव दिये जा रहे हैं मसलन एक की जगह अनेक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय खोलना, लोकनाटकों और उससे जुड़ी विधाओं के प्रोत्साहन प्रशिक्षण के लिये संस्थानों का निर्माण। ये सुझाव अच्छे हैं पर पूर्ण नहीं हैं। इनके अलावा भी बहुत कुछ किया जाना है। पर उसके लिये एक दूरदर्शी सोच के साथ काम होना जरूरी है। बहुत सारे आधे अधूरे निर्णय लेकर बेमन से किसी योजना को कुछ दूर तक चलाकर छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। मध्यप्रदेश में बालरंगमंडल की योजना इसी तरह दुर्गति को प्राप्त हुई है।
रंगकर्म की दिशा क्या होना चाहिए ? पहले कोई दिशा थी ? हमारा सौभाग्य है कि रंगकर्म की जो भी दिशा थी या है वो अच्छे जीवन मूल्यों को आदर्श मानती है। हमारे देश का रंगकर्म पुरातनपंथी, रूढिवादी विचारों के विरूद्ध प्रगतिशील विचारों का पोषक रहा है। आलेख हों या मंचन हर जगह मानवतावादी विचारधारा हावी रही है। और यह हमारी धरोहर है। इस दिशा के विरूद्ध काम करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं। पर अब तक न तो कामयाब र्हुइं और न उन्हें कोई स्वीकृति प्राप्त हुई। नाटकों में पिछले दिनों बहुत से तकनीकी प्रयोग देखने को मिले। तकनीक के भरोसे कला कैसे चलेगी ? नया करने की चाहत में लाइट साउंड और दूसरी तरकीबों, तकनीकों के भरोसे कुछ भी करने से रंगकर्म के जगत में कोई अमरत्व प्राप्त नहीं होगा।
मैं इप्टा से जुड़ा हुआ हूं। इप्टा से देश भर के हजारों रंगकर्मी जुडे़ हुए हैं। मध्यप्रदेश में ही इप्टा की शाखाएं 40 स्थानों में काम कर रही हैं। इप्टा में काम करने वाले रंगकर्मी जब भी नाटक उठाते हैं तो यह जरूर देखते हैं कि हम यह नाटक क्यों उठा रहे हैं। इसका क्या उद्देश्य है। ये हमारे काम को कहां तक पंहुचायेगा। कम से कम इतना सोचना तो हर रंगकर्मी के लिये जरूरी है कि वो जो नाटक उठा रहा है वो क्यों उठा रहा है। यदि महज हास्य रस उत्पन्न करने के लिये भी कोई नाटक उठाया जा रहा है तो उसमें कोई बुराई नहीं है पर समझ साफ होना चाहिए। इप्टा की जो इकाईयंां वर्षों से काम कर रही हैं उनके काम में काफी सफाई है। वो नियमित काम भी करती हैं। और काम में विविधता भी है। प्रायः नाटक के अलावा कला के अन्य आयामों और साहित्य के क्षेत्र में भी निरंतर कार्य होता रहता है। मेरी समझ से कोई भी नाटक ऐसा नही है जो केवल इप्टा वाले करते हों। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि आम तौर पर भारतीय रंग साहित्य विराट मानवीय मूल्यों को समेटता है इसीलिये वो सभी के लिये है। इसमें इप्टा और गैर इप्टा का कोई भेदभाव नहीं है। जिन्हें हम नकारात्मक शक्तियां मानते हैं वो भी कोई नया नाटक नहीं कर पाते। या तो करते ही नहीं या फिर करते हैं तो वही सामान्यतः उपलब्ध प्रचलित नाटक।
भारतीय रंगमंच की दशा और दिशा पर इससे ज्यादा क्या कहा जाये। रंगकर्म हो रहा है। अच्छा हो रहा है। होता रहे और होते रहने के लिये आवश्यक स्थितियां हम पैदा करते रहें तो अच्छी दिशा में होता रहेगा। -हिमांशु राय

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